"जब घर लौटना भी सुकून नहीं देता…"

 


सुबह 9 बजे ऑफिस के लिए निकलना,  

बस पकड़ना, ट्रैफिक सहना,  

ऑफिस में डेडलाइन, टारगेट और तनाव झेलना...


शाम को थक-हार कर घर लौटना —  

ये सोचकर कि अब शांति मिलेगी,  

एक कप चाय मिलेगी,  

कोई हाल पूछेगा।


पर क्या सच में ऐसा होता है?


घर पहुँचते ही कोई ताने देता है —  

"इतनी देर क्यों हो गई?"  

कोई बोलता है —  

"तुम्हें घर की कोई फिक्र नहीं है।"  

और कोई बस  

गुस्सा निकालने के लिए वजह ढूंढता है।


**वो इंसान जो बाहर पूरी दुनिया से लड़ रहा था,  

अब घर में भी अकेला लड़ता है।**


---


## 💭 **कड़वा लेकिन सच्चा सच:**  

जब घर भी सवाल करने लगे,  

तो इंसान कहीं का नहीं रहता।


कोई नहीं समझता कि  

वो सिर्फ पैसा कमाने नहीं,  

*ज़िम्मेदारियाँ निभाने* जा रहा था।


---


## 🙏 **एक विनती:**  

अगर आपके घर का कोई सदस्य  

ऑफिस से थक कर लौटता है —  

तो उससे लड़िए मत,  

उसे समझिए।


उसके लिए एक कप चाय और थोड़ी सी चुप्पी  

उसकी सारी थकावट मिटा सकती है।


क्योंकि  

**घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता…  

घर वो जगह है जहाँ थके हुए दिलों को शांति मिले।**

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