"जब बेटा कमाता है तो घर का सहारा कहलाता है, और जब नहीं कमा पाता… तो बोझ बन जाता है?"
एक बेटा जब नौकरी करता है,
हर महीने तनख्वाह लाकर घर देता है,
तो वो घर का 'गर्व' बन जाता है।
उसके आने से बिजली का बिल भरता है,
राशन आता है, छोटे भाई की फीस जाती है,
माँ की दवाइयाँ आती हैं…
पर जब वही बेटा किसी मजबूरी में,
किसी बीमारी में या नौकरी छूटने पर
कुछ दिन घर बैठता है…
तो लोग कहने लगते हैं —
"अब क्या करेगा?"
"कुछ काम क्यों नहीं करता?"
"बस घर पर ही पड़ा रहता है!"
**तब कोई नहीं पूछता —**
भूख लगी है या नहीं?
दिल कैसा है?
हालात कैसे हैं?
कमाने वाला बेटा आदर का पात्र है,
पर बेरोज़गार बेटा — एक ‘बोझ’ मान लिया जाता है।
पर कोई ये क्यों नहीं समझता —
कि **जो इंसान कल तक पूरे घर की जिम्मेदारी उठा रहा था,
वो आज खुद से भी लड़ रहा है।**
🙏 अगली बार अगर आपका घर का बेटा कुछ दिन घर पर बैठा हो,
तो उसे सवालों की नहीं,
थोड़े **समझने** और **साथ देने** की ज़रूरत है।
क्योंकि
**बेटा बोझ नहीं होता,
वक्त कभी-कभी भारी होता है।**

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