"खामोशी: जो कह न सके लफ़्ज़ों से"

 


कभी-कभी इंसान की खामोशी उसकी सबसे गहरी आवाज़ होती है।

हम अक्सर बोलते तो बहुत हैं, पर समझे कम जाते हैं।


वो जो चुप रहता है, वो भी कुछ कह रहा होता है —

शायद तकलीफ में है, या फिर भरोसा टूट चुका है।


रिश्तों में सबसे बड़ी गलतफहमी यही होती है कि

जो कुछ नहीं कह रहा, वो ठीक है।


पर ज़िंदगी का सच ये है —

खामोशी भी चीखती है... बस आवाज़ नहीं होती।


कभी-कभी किसी का हाथ थाम लेना,

बिना कुछ कहे उसके साथ बैठ जाना,

बहुत कुछ कह देता है जो शब्द नहीं कह पाते।


तो अगली बार जब कोई चुप हो,

उसे थोड़ा समझने की कोशिश करना।

क्योंकि हो सकता है, उसकी खामोशी ही

 सबसे बड़ा सच हो।


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